उच्च शिक्षा, स्वायत्तता और नौकरशाही का अतिक्रमण: प.वि.वि. के संदर्भ में एक गंभीर आत्ममंथन

डॉ. खगेंद्र कुमार

मुख्य संपादक, पॉलिटिक इंडिया

किसी भी जीवंत और प्रगतिशील समाज की रीढ़ उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। उच्च शिक्षण संस्थान केवल डिग्री बांटने वाले कारखाने नहीं होते, बल्कि वे राष्ट्र के वैचारिक केंद्र, लोकतंत्र के प्रहरी और बौद्धिक चेतना के प्रकाशस्तंभ होते हैं। दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों—चाहे वह यूनाइटेड किंगडम के प्राचीन विश्वविद्यालय हों या अमेरिका के शीर्ष संस्थान—इस सत्य को भली-भांति समझते हैं। यही कारण है कि तमाम वैचारिक असहमतियों और आलोचनाओं के बावजूद, राज्य और राष्ट्र-शक्तियाँ अपने विश्वविद्यालयों को उदार अनुदान और पूर्ण स्वायत्तता देती हैं। वे जानती हैं कि स्वतंत्र अनुसंधान, आलोचनात्मक विवेक और मौलिक विचारों का सृजन केवल भयमुक्त और स्वायत्त वातावरण में ही संभव है।

किंतु विडंबना यह है कि आज जब हम देश और दुनिया में अकादमिक स्वतंत्रता के नए आयाम गढ़ने की बात कर रहे हैं, तब हमारे अपने राज्य बिहार में उच्च शिक्षा की दिशा को लेकर एक गहरी और चिंताजनक सुगबुगाहट चल रही है। हाल ही में मीडिया के माध्यम से यह बात सामने आई है कि सरकार पूरे राज्य के लिए एक 'एकीकृत विश्वविद्यालय विधेयक' (Unified University Bill) लाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत पटना विश्वविद्यालय और इसके सभी अंगीभूत महाविद्यालयों को सामान्य विश्वविद्यालयों के साथ मिलाकर सचिवालय और जिला-स्तरीय प्रशासनिक मॉनिटरिंग के अधीन किए जाने का प्रस्ताव है। इस प्रस्तावित विधेयक की भनक से ही पटना विश्वविद्यालय के छात्र, शिक्षक और कर्मचारी अत्यंत आहत और आंदोलित हैं तथा परिसरों में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

यह समय केवल एक प्रशासनिक फेरबदल का नहीं, बल्कि यह सोचने का है कि हम अपनी शिक्षा व्यवस्था को किस दिशा में ले जा रहे हैं।

पटना विश्वविद्यालय: इतिहास, अस्मिता और समाज के प्रति सरोकार

पटना विश्वविद्यालय महज ईंट-पत्थरों से बनी इमारत का नाम नहीं है। 1 अक्टूबर 1917 को स्थापित यह संस्थान बिहार का पहला और देश का सातवां सबसे पुराना विश्वविद्यालय है। जब 1912 में बिहार एक स्वतंत्र प्रांत के रूप में उभरा, तब कलकत्ता विश्वविद्यालय के नियंत्रण से मुक्त होकर इस क्षेत्र को अपनी बौद्धिक और शैक्षणिक रीढ़ की आवश्यकता थी, और पटना विश्वविद्यालय ने उस ऐतिहासिक जरूरत को पूरा किया।

इस संस्थान का विभिन्न क्षेत्रों में अपूर्णीय योगदान रहा है। यहाँ के प्रत्यक्ष सरोकार वाले हजारों एलुमनाई ने देश और दुनिया को दिशा दी है। शिक्षा के क्षेत्र में, लेखन व साहित्य के क्षेत्र में, विधि के क्षेत्र में, प्रशासन और न्यायपालिका के क्षेत्र में इस संस्थान ने बेजोड़ प्रतिभाएं दी हैं। राजनीति के क्षेत्र में तथा देश के स्वतंत्रता संग्राम में यहाँ के शिक्षकों और छात्रों की भूमिका स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। यह संस्थान बिहार की राजनीति की प्रयोगशाला और 'सम्पूर्ण क्रांति' जैसे ऐतिहासिक आंदोलनों का केंद्र बिंदु रहा है। यहाँ से अनगिनत समाज सेवी, अर्थशास्त्री, प्रख्यात लेखक और प्रशासनिक अधिकारी निकले हैं जिन्होंने राज्य और देश की व्यवस्था को चलाया है। समाज के शोषित और वंचित वर्गों के लिए उच्च शिक्षा के दरवाजे खोलकर इसने सामाजिक न्याय की नींव को मजबूत किया है।

आज के उदारीकरण और निजीकरण के दौर में इस विश्वविद्यालय का औचित्य और अधिक बढ़ गया है। यह संस्थान मेधावी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को न्यूनतम शुल्क पर उच्च कोटि की शिक्षा प्रदान कर सामाजिक समावेशन का सबसे बड़ा स्तंभ बनता है।

नौकरशाही का अति-नियंत्रण और अकादमिक स्वायत्तता पर प्रहार

यहाँ एक कड़वा सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसी नीतियां और विधेयक गढ़ता कौन है? जनता द्वारा चुने गए हमारे माननीय जनप्रतिनिधियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति हमारी अगाध निष्ठा है। लेकिन यह अत्यंत क्षोभ का विषय है कि नीति-निर्माण की इस संवेदनशील प्रक्रिया में प्रशासनिक अमले (नौकरशाही) की संकीर्ण और अहम्-तुष्टि वाली सोच हावी हो जाती है।

प्रशासनिक अधिकारियों का मूल दायित्व जनप्रतिनिधियों को सही डेटा, अकादमिक साक्ष्य, वैश्विक दृष्टांत और सटीक नीतियां उपलब्ध कराना है, न कि अपने संकीर्ण प्रशासनिक वर्चस्व को शिक्षा व्यवस्था पर थोपना। अफसोस की बात है कि नौकरशाह अपनी नियंत्रण की लालसा और तानाशाही मानसिकता में नीति-निर्माताओं को लगातार गुमराह कर रहे हैं। राजनेताओं को सही अकादमिक साक्ष्य देने के बजाय अपने प्रशासनिक एजेंडे को थोपने का प्रयास किया जा रहा है। यह वही ब्यूरोक्रेसी है जिसका समग्र प्रशासनिक रिकॉर्ड विकास और शिक्षा के मामले में सबसे कमजोर रहा है।

विडंबना यह है कि जो अधिकारी उच्च शिक्षा पर प्रशासनिक नियंत्रण का ताना-बाना बुन रहे हैं, वे अपने बच्चों को देश-विदेश के महंगे निजी संस्थानों में पढ़ाते हैं। लेकिन आज पटना विश्वविद्यालय और बिहार के इन महाविद्यालयों में मूल रूप से समाज के निम्न-मध्यम वर्ग, शोषित, वंचित और गरीब परिवारों के होनहार बच्चे अपनी उच्च शिक्षा की उम्मीद लेकर आते हैं। जो अधिकारी खुद इन परिसरों की जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं, वे ही आज एसी कमरों में बैठकर इन गरीबों के भविष्य को रौंदने वाला विधेयक तैयार करवा रहे हैं।

यदि इन्हें शिक्षा व्यवस्था की जरा भी समझ होती और वर्तमान सरकार द्वारा लाई गई उस दूरदर्शी एवं जीवंत राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के प्रावधानों के प्रति इनके मन में थोड़ा भी आदर-सम्मान होता, तो ये कभी भी इस प्रकार का विध्वंसक और संकीर्ण विधेयक लाने का दुस्साहस नहीं करते। एनईपी 2020 स्पष्ट रूप से संस्थागत स्वायत्तता, अकादमिक स्वतंत्रता और अनुसंधान आधारित शिक्षा की वकालत करती है, जबकि नौकरशाही का यह मॉडल हर चीज को पुलिसिया तंत्र और फाइलों के लाल फीते में जकड़ देना चाहता है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य और सहजीवी संबंध

दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक और उन्नत देश में उच्च शिक्षण संस्थानों को जिला अधिकारियों या सचिवालय के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं चलाया जाता। ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, हार्वर्ड या देश के शीर्ष संस्थान इसलिए महान हैं क्योंकि वहाँ अकादमिक निर्णय अकादमिक विशेषज्ञ लेते हैं, बाबू नहीं।

राज्य और विश्वविद्यालयों के बीच का रिश्ता पुलिस और थाने का नहीं, बल्कि एक सहजीवी (Symbiotic) रिश्ता है। राज्य संसाधन देता है और बदले में विश्वविद्यालय समाज को दिशा और प्रकाश देते हैं। यदि महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक नियंत्रण को सचिवालय के हवाले कर दिया गया, तो परिसरों में सृजनशीलता, संवाद और आलोचनात्मक चिंतन का गला घोंट दिया जाएगा।

निष्कर्ष और समयोचित अपील

आज आवश्यकता इस बात की है कि:

परिसर की आवाज पर ध्यान दिया जाए: पिछले कई दिनों से पटना विश्वविद्यालय परिसर में इस प्रस्तावित बिल के खिलाफ जो शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन चल रहा है, हुक्मरानों को उसकी जायज आवाज को सुनना चाहिए और तत्काल सकारात्मक आश्वासन देना चाहिए ताकि पठन-पाठन का कार्य सुचारू रूप से चल सके।

व्यापक सार्वजनिक बहस हो: इस प्रस्तावित विधेयक को जल्दबाजी में थोपने के बजाय पूरे राज्य में सार्वजनिक बहस के लिए खोला जाए।

विशेषज्ञों की स्वतंत्र समिति बने: इस विधेयक और शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप पर पुनर्विचार के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जाए, जिसमें देश-प्रदेश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, प्रबुद्ध नागरिकों और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े जनप्रतिनिधियों को शामिल किया जाए, ताकि पूरी निष्पक्षता से इस पर संस्तुति मिल सके।

ब्यूरोक्रेटिक हस्तक्षेप का बहिष्कार हो: शिक्षा के संचालन से नौकरशाही के अवांछित और दंडात्मक हस्तक्षेप को पूरी तरह खारिज किया जाए तथा पटना विश्वविद्यालय के विशिष्ट, पूर्ण अंगीभूत (Constituent) स्वरूप और इसकी स्वायत्तता को अक्षुण्ण रखा जाए।

बिहार के एक युवा, ऊर्जावान और प्रगतिशील मुख्यमंत्री से पूरे राज्य को यह उम्मीद है कि वे नौकरशाही के संकीर्ण और अहम्-तुष्टि वाले प्रस्तावों को दरकिनार करेंगे। आइए, शिक्षा को लालफीताशाही के बंधनों से मुक्त कर एक ऐसी स्वतंत्र, सृजनात्मक और स्वायत्त व्यवस्था की नींव रखें जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बने।